राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी
वॉशिंगटन डी.सी.
10 जून 1963

अध्यक्ष एंडरसन, संकाय के सदस्यगण, न्यास परिषद, विशिष्ट अतिथिगण, मेरे पुराने सहकर्मी, सीनेटर बॉब बायर्ड, जिन्होंने कई वर्ष रात्रि विधि विद्यालय में उपस्थित रहकर डिग्री हासिल की, जबकि मैं अपनी डिग्री अगले 30 मिनटों में हासिल कर रहा हूं, विशिष्ट अतिथिगण, देवियों और सज्जनों. :

ये अत्यंत गर्व की बात है कि मैं मैथोडिस्ट चर्च द्वारा प्रायोजित, बिशप जॉन फ़्लॅचर हर्स्ट द्वारा स्थापित और राष्ट्रपति वूड्रो विल्सन द्वारा 1914 में पहली बार खोले गए अमेरिकन विश्वविद्यालय के इस समारोह में भाग ले रहा हूं. ये एक नया और विकसित होता हुआ विश्वविद्यालय है, लेकिन इसने पहले से ही इतिहास के निर्माण और सार्वजनिक मामलों के प्रति समर्पित शहर में इतिहास और सार्वजनिक मामलों के अध्ययन संबंधी बिशप हर्स्ट की प्रबुद्ध आशाओं को पूरा कर दिया है. किसी भी रंग या नस्ल के व्यक्ति जो ज्ञानार्जन करना चाहते हैं, उन सभी के लिए उच्चतर शिक्षा के इस संस्थान को प्रायोजित करने के लिए यह राष्ट्र इस क्षेत्र और राष्ट्र के मैथोडिस्ट के प्रति आभारी है, और मैं उन सभी की प्रशंसा करता हूं जो आज यहां से उपाधि प्राप्त कर रहे हैं.

प्रोफेसर वूड्रो विल्सन ने एक बार कहा था कि विश्वविद्यालय से उत्तीर्ण होकर निकले प्रत्येक व्यक्ति को अपने राष्ट्र और समय का प्रतिनिधित्व करना चाहिए, और मैं आश्वस्त हूं कि इस संस्थान से उपाधि प्राप्त करके निकले पुरुष और स्त्रियां अपने सहयोग और अपनी योग्यताओं के द्वारा जनसेवा और जन-समर्थन को.निरंतर अपना सहयोग प्रदान करते रहेंगे तथा इसे नई ऊंचाइयां प्रदान करेंगें.

"एक विश्वविद्यालय से अधिक सुंदर बहुत कम सांसारिक चीज़ें हैं," जॉन मेसफ़ील्ड ने ब्रिटेन के विश्वविद्यालयों की प्रशंसा में लिखा था—और उनके शब्द आज भी उतने ही सत्य हैं. उनका अर्थ शिखरों और मीनारों से नहीं था, परिसर की हरियाली और लताच्छादित दीवारों से भी नहीं. उन्होंने विश्वविद्यालय के भव्यतापूर्ण सौन्दर्य की प्रशंसा करते हुए ये शब्द इसलिए कहे थे, क्योंकि यही वह स्थान है जहां “वे व्यक्ति जो अज्ञान से घृणा करते हैं, ज्ञानप्राप्ति हेतु प्रयास कर सकते हैं, वे जो सत्य को ग्रहण करते हैं दूसरों को इससे अवगत कराने का प्रयास कर सकते हैं”.

इसलिए मैंने, इस समय और इस स्थान को एक ऐसे विषय पर परिचर्चा हेतु चुना है जिसके बारे में अज्ञानता की भरमार है और सत्य की ग्रहणशीलता अत्यंत विरल है—तब भी ये इस धरती पर सर्वाधिक महत्वपूर्ण विषय है: विश्व शांति.

मेरा तात्पर्य किस प्रकार की शांति से है? हमें किस प्रकार की शांति की तलाश है?अमेरिकी हथियारों के बल पर संसार पर लादे गए अमेरिकी युद्ध विराम की नहीं. कब्रों की शांति अथवा दासों की सुरक्षा की नहीं. मैं वास्तविक शांति की बात कर रहा हूं, एक ऐसी शांति जो धरती पर जीवन को जीने योग्य बनाए, एक ऐसी शांति जो व्यक्ति व राष्ट्र के विकास में योगदान दे और उनकी आशा को जीवित रखे तथा उन्हें अपनी भावी पीढ़ियों के लिए एक बेहतर जीवन का निर्माण करने योग्य बनाए –न केवल अमेरिकियों के लिए शांति बल्कि सभी पुरुष और स्त्रियों के लिए शांति–न केवल हमारे समय में शांति बल्कि हमेशा के लिए शांति.

मैं शांति की बात युद्ध के एक नए रूप के कारण  करता हूं.ऐसे समय में समग्र युद्ध का कोई अर्थ नहीं है जब वृहत शक्तियां विशाल और सापेक्षतः दुर्भेद्य नाभिकीय शक्तियों को बनाए रखने में सक्षम हैं और बिना उनका सहारा लिए आत्मसमर्पण करने से इंकार कर सकती हैं.ऐसे समय में युद्ध का कोई अर्थ नहीं है जब द्वितीय विश्वयुद्ध में सभी संयुक्त वायु सेनाओं द्वारा प्रयुक्त विस्फोटक शक्ति का लगभग दस गुना एक अकेले नाभिकीय हथियार में भरा हो. ऐसे समय में युद्ध का कोई अर्थ नहीं है जब नाभिकीय विनिमय द्वारा उत्पन्न घातक विष वायु और जल और मिट्टी और बीज द्वारा विश्व के सुदूरवर्ती क्षेत्रों और अजन्मी पीढ़ियों तक पहुंच जाएगा.

आज अरबों डॉलर प्रतिवर्ष का खर्च उन हथियारों पर हो रहा है जिन्हें इस मकसद से हासिल किया गया है कि शांति बनाए रखने के लिए हमें कभी भी उनके प्रयोग की आवश्यकता न पड़े. लेकिन निश्चित तौर पर ऐसे व्यर्थ संग्रह को हासिल करना ही ,—जो केवल विनाश कर सकते हैं और निर्माण कभी नहीं—शांति सुनिश्चित करने का कोई सर्वोत्तम या अकेला साधन नहीं है.

इसलिए मैं शांति की बात करता हूं, जो किसी भी तर्कशील मनुष्य का तर्कशील उद्देश्य होगा मैं महसूस करता हूं कि शांति का कार्य युद्ध जैसा नाटकीय नहीं है—और ऐसा करने वाले की बातें लगातार अनसुनी कर दी जाती हैं.लेकिन हमारे पास कोई और आवश्यक कार्य नहीं है.

कुछ कहते हैं कि विश्व शांति या विश्व कानून या वैश्विक नि:शस्त्रीकरण की बातें करना बेकार है—और बेकार ही रहेगा जब तक कि सोवियत संघ के नेता अधिक प्रबुद्ध रुख नहीं अपनाते. मैं आशा करता हूं वे अपनाएंगे. मुझे विश्वास है हम उन्हें ऐसा करने में सहायता कर सकते हैं. लेकिन मेरा यह भी विश्वास है कि हमें अपने रवैए के बारे में फिर से विचार करना चाहिए—एक व्यक्ति या एक राष्ट्र के तौर पर—क्योंकि हमारा रवैया भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि उनका. और इस विद्यालय के प्रत्येक उपाधि धारक को, प्रत्येक विचारवान नागरिक को जो युद्ध का विरोधी है और शांति लाना चाहता है, अपने भीतर झांकने से शुरुआत करनी चाहिए—शांति की संभावनाओं के प्रति, सोवियत संघ के प्रति, शीतयुद्ध के प्रति और घरेलू स्वतंत्रता और शांति के प्रति अपने खुद के रवैए का परीक्षण करते हुए.

सबसे पहले: हम शांति के ही प्रति अपने रवैए का परीक्षण करें.हम में से बहुत से लोगों का विचार होगा कि यह असंभव है. बहुत से लोग सोचेंगे कि यह अवास्तविक है. लेकिन यह एक खतरनाक, पराजयवादी धारणा है. यह रवैया युद्ध को अपरिहार्य मानता है - यह मानता है कि मानव जीवन अभिशप्त है - और हम ऐसी शक्तियों के शिकंजे में जकड़े हैं, जिन पर हमारा कोई बस नहीं है.

हमें इस दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं करना चाहिए. हमारी समस्याएं हम मानवों द्वारा ही उत्पन्न की गई है, इसलिए इन्हें सुलझाना भी हमारे ही हाथ में है. और मनुष्य मात्र की क्षमता असीम है. मानव की नियति से जुड़ी किसी भी समस्या का समाधान मानव की क्षमता से बाहर नहीं है.मानव के विवेक और दृढ़ निष्ठा ने अक्सर कठिन से कठिन समस्याओं का समाधान किया है—और मेरा विश्वास है हम फिर से ऐसा कर सकते हैं.

मैं शांति और सद्भावना संबंधी किसी पूर्ण व असीम संकल्पना का उल्लेख नहीं कर रहा हूं जिसकी कुछ लोग कल्पना करते हैं और अंधभक्त सपने देखते हैं. मैं आशाओं और सपनों के महत्व से इंकार नहीं कर रहा हूं लेकिन केवल उसे ही अपना तात्कालिक लक्ष्य बनाकर हम केवल हतोत्साह और अविश्वसनीयता को निमंत्रण देते हैं.

इसके बजाय क्यों न हम अधिक व्यावहारिक, अधिक साध्य शांति पर अपना ध्यान केंद्रित करें—मानव प्रकृति में आए किसी आकस्मिक परिवर्तन पर नहीं बल्कि मानव समुदायों में हुए क्रमिक विकास पर आधारित—ठोस कार्यों और असरदार समझौतों की शृंखला पर आधारित जो सभी संबंधित पक्षों के हित में हो. इस शांति की कोई एक, आसान कुंजी नहीं है—कोई शानदार या जादुई मंत्र नहीं जिसे एक या दो शक्तियों द्वारा अपनाया जा सके.वास्तविक शांति को कई राष्ट्रों का, कई कार्यों के योग का परिणाम होना चाहिए.इसे स्थिर नहीं, गतिशील, प्रत्येक नयी पीढ़ी की चुनौतियों का सामना करने के लिए परिवर्तनशील होना चाहिए. शांति एक प्रक्रिया है—समस्याएं सुलझाने का एक मार्ग.

हालांकि ऐसी शांति के बावजूद भी झगड़े और हितों के टकराव होंगे, जैसे परिवारों और राष्ट्रों के भीतर होते हैं. सामुदायिक शांति की तरह विश्व शांति के लिए इस बात की आवश्यकता नहीं होती कि प्रत्येक व्यक्ति अपने पड़ोसी से प्रेम करे-इसके लिए केवल केवल यह आवश्यक है कि वे अपने विवादों का शांतिपूर्ण निपटारा करके आपस में सहिष्णुता से एक साथ रहें. और इतिहास हमें शिक्षा देता है कि राष्ट्रों के बीच की वैमनस्यता दो व्यक्तियों की तरह ही हमेशा नहीं रहती.चीज़ों को लेकर हमारी पसंद या नापसंद चाहे जितनी भी सुदृढ़ क्यों न हो, समय और घटनाओं का ज्वार-भाटा अक्सर राष्ट्रों और पड़ोसियों के रिश्तों में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाता है.

इसलिए हम इसका परिरक्षण करें. ज़रुरी नहीं शांति अव्यवहारिक हो और युद्ध अपरिहार्य हो. अपने लक्ष्य को और अधिक स्पष्टता से परिभाषित करके तथा इसे और अधिक प्रंबधनीय और कम दूरस्थ दिखने वाला बनाकर, हम लोगों को इससे परिचित करा सकते हैं, उन्हें आशा दे सकते हैं और शांति के लिए उन्हें प्रयासरत कर सकते हैं.

दूसरा: आइए, सोवियत संघ के प्रति अपने रुख पर हम दोबारा विचार करें. ये सोचना हतोत्साहित करने वाला है कि उनके नेतागण वस्तुत: उसमें विश्वास करते हैं जो उनके प्रचारक लिखते हैं. सैन्य योजना पर हालिया प्राधिकारिक सोवियत मूलपाठ को पढ़ना और ये देखना बहुत हतोत्साहित करने वाला है, पृष्ठ दर पृष्ठ, सभी निराधार और अविश्वसनीय दावे—जैसे ये आरोप कि “अमेरिकी साम्राज्यवादी मंडलियां विभिन्न प्रकार के युद्धों के आरंभ की तैयारियां कर रही हैं” कि सोवियत संघ के विरुद्ध अमेरिकी साम्राज्यवादियों द्वारा शुरु किए जा रहे निरोधक युद्ध का बेहद गंभीर ख़तरा मंडरा रहा है. [और ये कि] अमेरिकी साम्राज्यवादियों का राजनैतिक लक्ष्य यूरोपीय और अन्य पूंजीवादी देशों को आर्थिक और राजनैतिक तौर पर गुलाम बनाना है , [और] विश्व पर प्रभुत्व हासिल करना है, और वह भी आक्रामक युद्धों के ज़रिए."

सचमुच, जैसा कि बहुत पहले लिखा गया था: "चोर की दाढ़ी में तिनका होता है." फिर भी ऐसे सोवियत वक्तव्यों को पढ़कर अफसोस होता है – उनके और हमारे बीच की यह खाई निराश करने वाली है लेकिन यह एक चेतावनी भी है--अमेरिकी लोगों के लिए चेतावनी कि सोवियत संघ के लोगों की तरह उसी जाल में न फंसें, दूसरी ओर का केवल एक विकृत और निराशाजनक दृश्य न देखें, संघर्ष को अपरिहार्य, समायोजन को असंभव, और संप्रेषण को मात्र धमकियों का आदान-प्रदान न समझें,

कोई भी सरकार अथवा सामाजिक व्यवस्था इतनी बुरी नहीं होती कि इसके लोगों को सद्गुणों से रहित समझा जाए. एक अमेरिकी के तौर पर हम साम्यवाद को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गौरव का निषेध करने वाला अरुचिकर सिद्धांत मानते हैं . लेकिन इसके बावजूद भी हम रूसी नागरिकों का—विज्ञान और अंतरिक्ष के क्षेत्र में, आर्थिक और औद्योगिक विकास में, संस्कृति में, और साहसपूर्ण कायों में उनकी उपलब्धियों के लिए, उनकी सराहना कर सकते हैं

दोनों ही देशों के लोगों में कई बातें और गुण एक जैसे हैं, लेकिन सबसे अधिक समान युद्ध के प्रति हमारी घृणा है. विश्व की बड़ी नाभिकीय शक्तियों से बिल्कुल अलग, हम कभी भी आपस में युद्धरत नहीं हुए, और युद्ध के इतिहास में किसी भी राष्ट्र ने इतनी क्षति नहीं उठाई जितनी द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान सोवियत संघ को सहनी पड़ी थी. कम से कम 2 करोड़ नागरिकों ने जानें गंवाईं, करोड़ों घर और खेत जलाए अथवा लूट लिए गए. क़रीब दो तिहाई उद्योंगों समेत राष्ट्र का एक तिहाई भूभाग बंजर ज़मीन में बदल गया—एक ऐसी हानि, जो शिकागो के पूर्व में स्थित इस देश के हिस्से के उजड़ने के बराबर है.

आज, अगर फिर से कभी युद्ध भड़क उठे—चाहे कैसे भी--हम दो देश प्रारंभिक निशाना बनेंगे. यह एक विडंबनापूर्ण किंतु सही तथ्य है कि दो सर्वाधिक शक्तिशाली ताकतें उजड़ने के सबसे अधिक खतरों से घिरी हुई हैं. जो कुछ हमने बनाया है, जिन चीज़ों के लिए हमने अपना पसीना बहाया है, वह सब केवल पहले 24 घण्टों में नष्ट हो जाएगा. और शीत युद्ध के दौरान भी, जो इस राष्ट्र के निकट सहयोगियों सहित कई सारे राष्ट्रों पर बोझ और खतरे लादता है—हम दो राष्ट्र सर्वाधिक भारी बोझ सहन करते हैं, हम दोनों हथियारों पर भारी धनराशि खर्च करते हैं जिसका बेहतर उपयोग अज्ञान, गरीबी, और बीमारियों से लड़ने के लिए किया जा सकता था. हम दोनों घृणित और खतरनाक चक्र में फंसे हुए हैं जिसमें एक पक्ष पर संदेह दूसरे पक्ष पर संदेह को जन्म देता है, और नए शस्त्र प्रतिशस्त्र उत्पन्न करता है.

संक्षेप में, संयुक्त राज्य व इसके सहयोगी, और सोवियत संघ व इसके सहयोगी, दोनों ही न्यायपूर्ण और वास्तविक शांति कायम करने तथा हथियारों की दौड़ को रोकने में गहरी रूचि रखते हैं. इस दिशा में किए गए समझौते सोवियत संघ के साथ ही हमारे भी हित में हैं—और यहां तक कि सर्वाधिक शत्रुतापूर्ण राष्ट्रों पर भी इस भी का यकीन किया जा सकता है कि वे संधि संबंधी ऐसे प्रतिबंधों और मात्र ऐसे ही प्रतिबंधों को स्वीकार कर लेंगे जो उनके अपने हित में हों.

इसलिए, केवल हम अपने मतभेदों को लेकर अंधे न बनें—बल्कि हम अपने संयुक्त हितों की ओर भी ध्यान दें और उन तरीक़ों पर भी जिनके द्वारा ये मतभेद सुलझाए जा सकते हैं. और अगर हम फिलहाल अपने मतभेदों को समाप्त नहीं कर सकते, तो कम से कम विश्व को विविधता के लिए सुरक्षित बनाने में सहायता तो कर ही सकते हैं. और, अंतिम विश्लेषण के तौर पर, सच्चाई यह है कि हम सभी इस छोटे से ग्रह पर वास करते हैं. हम एक ही हवा में सांस लेते हैं. हम सब अपने बच्चों के भविष्य को संजोते हैं. और हम सभी को एक दिन ये दुनिया छोड़कर चले जाना है.

तीसरा: आइए, यह याद रखते हुए कि हम बहस के बिंदुओं के खोजते हुए किसी बहस में नहीं उलझे हुए हैं, शीतयुद्ध के प्रति अपने रुख का पर दोबारा विचार करते हैं. हम यहां आक्षेप लगाने या किसी के बारे में कोई राय कायम करने के लिए नहीं आए हैं. यह विश्व जैसा है, हमें उसे वैसे ही अपनाना होगा, न कि इस बात पर उलझना है कि अगर पिछले 18 वर्षों का इतिहास भिन्न होता तो विश्व का चेहरा कैसा रहा होता.

इसलिए हमें इस आशा के साथ कि साम्यवादी प्रखण्ड के भीतर रचनात्मक परिवर्तन ऐसे व्यावहारिक हल खोज सकते हैं जो अभी पहुंच के बाहर दिखाई देते हैं, शांति की खोज के कठिन कार्य में जुट जाना होगा. हमें साम्यवादी हितों को भी ध्यान में रखते हुए अपनी गतिविधियां इस प्रकार संचालित करनी होंगी जिससे वास्तविक शांति हासिल की जा सके. सबसे बढ़कर, अपने स्वयं के अत्यंत महत्वपूर्ण हितों का बचाव करते हुए, नाभिकीय शक्तियों को उन विवादों से बचना होगा जो शर्मनाक वापसी अथवा एक नाभिकीय युद्ध जैसी स्थितियों को जन्म देते हैं. नाभिकीय युग में इस प्रकार का रुख केवल हमारी नीतियों के दिवालियापन का साक्षी होगा—अथवा विश्व के लिए एक सामूहिक इच्छा मृत्यु का.

इन दृष्टियों से सुरक्षित बनाने के लिए, अमेरिका के हथियार अनुत्तेजनात्मक, सावधानीपूर्वक नियंत्रित, रोके जाने लायक रूपरेखा वाले, और चयनित प्रयोग हेतु क्षमतावान हैं. हमारी सैन्य शक्तियां शांति के प्रति प्रतिबद्ध और आत्म-संयम द्वारा अनुशासित हैं.हमारे राजनयिकों को अनावश्यक रूप से क्षोभकर और शब्दाडंबरपूर्ण उग्रता से बचने के निर्देश दिये गए हैं.

हम अपनी सुरक्षा से समझौता किए बिना तनाव से मुक्ति पा सकते हैं. और जहां तक हमारा प्रश्न है, हमें अपना दृढ़निश्चय साबित करने के लिए धमकियों का प्रयोग करने की आवश्यकता नहीं है. इस भय से कि हमारी आस्था क्षीण होगी, विदेशी प्रसारणों पर रोक लगाने की आवश्यकता नहीं है. हम अपनी व्यवस्था को किसी अनिच्छुक व्यक्ति पर नहीं थोपना चाहते—किंतु पृथ्वी पर किसी भी व्यक्ति के साथ शांतिपूर्ण प्रतियोगिता करने के हम इच्छुक हैं और इसमें सक्षम हैं.

इस बीच हम संयुक्त राष्ट्र को मज़बूत बनाने, इसकी आर्थिक समस्याओं को सुलझाने, इसे शांति के लिए और अधिक प्रभावी औज़ार बनाने, इसे एक वास्तविक वैश्विक सुरक्षा प्रणाली में विकसित करने का प्रयास करते हैं—ऐसी प्रणाली जो कानून के आधार पर मतभेदों को सुलझाने में सक्षम हो, बड़े और छोटे की सुरक्षा को सुनिश्चित करने वाली हो, और ऐसी शर्तें लागू करने वाली हो जिनके तहत हथियारों को अंतत: नष्ट किया जा सके.

साथ ही हम गैर-साम्यवादी विश्व में शांति बनाए रखना चाहते हैं, जहां कई राष्ट्र, जो सभी हमारे मित्र हैं, पश्चिमी एकता को कमज़ोर करने वाले मुद्दों पर बंटे हुए हैं - ऐसे मुद्दे, जो साम्यवादी दखल को आमंत्रित करते हैं या जिनके कारण युद्ध का ख़तरा पैदा हो सकता है वेस्ट न्यू गिनी में, या कांगो में, मध्य पूर्व में, और भारतीय उपमहाद्वीप में हमारी कोशिशें दोनों ओर से आलोचना के बावजूद दृढ़ और सहनशील बनी हुई हैं. हमने अपने निकटतम पड़ोसियों के साथ छोटे लेकिन महत्वपूर्ण विवादों का निपटारा करके—जैसे मैक्सिको में और कनाडा में, दूसरों के लिए उदाहरण रखने की भी कोशिश की है.

अन्य राष्ट्रों के बारे में बात करते हुए मैं एक मुद्दा स्पष्ट करना चाहूंगा. हम कई राष्ट्रों के साथ गठजोड़ में बंधे हुए हैं.ये गठजोड़ अस्तित्व में हैं क्योंकि हमारे और उनके सरोकार पूरी तरह से मिलते हैं. उदाहरण के लिए ,पश्चिमी यूरोप और पश्चिमी बर्लिन के बचाव की हमारी प्रतिबद्धता, हमारे महत्वपूर्ण हितों के कारण कम नहीं हुई है. अन्य राष्ट्रों और अन्य लोगों की कीमत पर सोवियत संघ के साथ संयुक्त राज्य कोई भी सौदा नहीं करेगा, केवल इसलिए नहीं कि वे हमारे भागीदार हैं, बल्कि इसलिए भी कि उनके और हमारे हित एकाकार हैं

बहरहाल, न केवल स्वतंत्रता की रक्षा की दृष्टि से, बल्कि शांति के पथ पर चलने की दृष्टि से भी हमारे हित एकाकार हैं. ये हमारी आशा है—और गठजोड़ की योजनाओं का मकसद भी—कि सोवियत संघ को इस बात के लिए सहमत करें कि उसे भी प्रत्येक राष्ट्र को अपना भविष्य चुनने देना चाहिए,  तब तक जब तक कि वह चयन दूसरों के चयन में दखलअंदाज़ी न करे.अपनी राजनीतिक और आर्थिक प्रणाली को औरों पर लादने की साम्यवादी मुहिम आज विश्व के तनाव का मूल कारण है. इस बात में कोई संदेह नहीं है कि, यदि सभी राष्ट्र दूसरों के फैसलों में हस्तक्षेप करने से बाज़ आएं, तो शांति कहीं अधिक सुनिश्चित होगी.

इसे विश्व कानून प्राप्त करने के लिए नए प्रयत्न की आवश्यकता होगी—वैश्विक विचार-विमर्श हेतु एक नया संदर्भ. इसके लिए सोवियत नागरिकों और हमारे बीच पारस्परिक समझ का विकास करने की आवश्यकता है और समझ का विकास करने के लिए संपर्क तथा संवाद का विकास आवश्यक है.इस दिशा में एक कदम, मॉस्को और वॉशिंगटन के बीच सीधी बातचीत का प्रस्ताव है, ताकि दोनों ओर के खतरनाक विलंबों, गलतफ़हमियों, और संकट के समय में एक-दूसरे की गतिविधियों का गलत अर्थ निकालने से बचा जा सके

हम जेनेवा में भी हथियारों की दौड़ की तीव्रता को रोकने और आकस्मिक युद्ध के जोखिमों को कम करने के लिए उठाए जाने वाले शस्त्र नियंत्रण संबंधी कदमों के विषय में बातचीत कर रहे हैं.बहरहाल, जेनेवा में हमारा मुख्य और दीर्घकालिक हित, आम और समग्र नि:शस्त्रीकरण है—चरणों में संपन्न होने वाली एक प्रक्रिया, जो समानांतर राजनैतिक विकास में सहायक है तथा जिसके द्वारा ऐसी शांति व्यवस्था का विकास होता है, जो हथियारों का स्थान लेगी. नि:शस्त्रीकरण के लिए वर्ष 1920 से यह सरकार प्रयासरत है. इसे पिछले तीन प्रशासनों द्वारा अत्यावश्यक माना गया है. और आज भले ही आसार चाहे जितने भी मंद दिखें, हमारा इरादा इन प्रयासों को जारी रखना है—ताकि हमारे अपने देश के साथ ही बाकी के देश, भी इस बात को समझ सकें कि निःशस्त्रीकरण से होने वाली समस्याएं और इससे जुड़ी संभावनाएं क्या हैं.

इन समझौता-वार्ताओं का एक प्रमुख क्षेत्र, जहां निष्कर्ष दिखता है, नाभिकीय परीक्षणों की बहिष्कार संधि है हालांकि इसकी एक नयी शुरुआत अति-आवश्यक है, इस प्रकार की संधि का निष्कर्ष, जो निकट होते हुए भी बहुत दूर है, अपने सबसे खतरनाक क्षेत्रों में से एक में बढ़ती हथियारों की दौड़ पर रोक लगाएगा. यह नाभिकीय शक्तियों को सबसे बड़े जोखिमों में से एक को अधिक प्रभावपूर्ण ढंग से निपटा पाने की स्थिति में ले आएगा जिसका सामना मनुष्य 1963 में कर रहा है, और वह है नाभिकीय हथियारों का और अधिक विस्तार.ये हमारी सुरक्षा को बढ़ाएगा—ये युद्ध के आसार को कम करेगा.निश्चित तौर पर ये लक्ष्य हमारे निरंतर प्रयासों के लिए महत्वपूर्ण हैं. ये लक्ष्य न तो अपने प्रयासों को समग्र रूप से त्याग देने का प्रलोभन देते हैं और न ही महत्वपूर्ण तथा उत्तरदायी सुरक्षा उपायों के प्रति हमारी दृढ़प्रतिज्ञता को कम करने के लिए उकसाते हैं.

इसलिए, मैं इस दिशा में दो महत्वपूर्ण निर्णयों की घोषणा करने के लिए इस अवसर का उपयोग कर रहा हूं.

पहला: अध्यक्ष ख्रुश्चेव, प्रधानमंत्री मैक’मिलन, और मैं सहमत हो चुके हैं कि विस्तृत परीक्षण प्रतिबंध संधि पर शीघ्र समझौते की आशा के साथ जल्द ही मॉस्को में एक उच्चस्तरीय वार्ता प्रारंभ होगी. हमारी अपेक्षाएं अतीत में हुई घटनाओं को अनदेखा नहीं करेंगी—लेकिन हमारी आशाओं के साथ सभी मनुष्यों की आशाएं जुड़ी हुई हैं.

दूसरा: इस विषय पर अपनी सद्भावना और सत्यनिष्ठ धारणाओं.को स्पष्ट करने के लिए, अब मैं घोषणा करता हूं कि संयुक्त राज्य का पृथ्वी के वातावरण में नाभिकीय परीक्षण करने का कोई भी इरादा नहीं है जब तक कि अन्य राष्ट्र ऐसा न करें. हम पुनरारंभ करने वाले पहले नहीं होंगे. ऐसी घोषणा किसी औपचारिक बाध्यकारी संधि की पर्याय नहीं है, लेकिन मुझे आशा है यह उसे प्राप्त करने में सहायक होगी. न ही ये नि:शस्त्रीकरण की पर्याय है लेकिन मुझे आशा है यह उसे प्राप्त करने में हमारी सहायता करेगी.

अंत में, मेरे साथी देशवासियों, आइए हम यहां अपने घर में ही शांति और स्वतंत्रता के प्रति अपने रुख पर विचार करें. हमारे अपने समाज की गुणवत्ता और प्रकृति विदेशों में हमारे प्रयासों की समर्थक और उन्हें उचित ठहराने वाली होनी चाहिए. अपने निजी जीवन में भी हमें निष्ठा के साथ इसका पालन करना होगा—आप में से जितने भी आज उपाधि प्राप्त कर रहे हैं, वे अवैतनिक रूप से विदेशों में भेजी जाने वाली शांति सेनाओं या देश के भीतर प्रस्तावित राष्ट्रीय सेवा कोर में सेवा कार्य का एक अनुपम अवसर प्राप्त करेंगे.

लेकिन हम जहां भी हों, अपने रोज़मर्रा के जीवन में युगों पुराने इस विश्वास को बनाए रखें कि शांति और स्वतंत्रता एक साथ चलते हैं.हमारे शहरों में से कई शहरों की, शांति आज सुरक्षित नहीं है क्योंकि स्वतंत्रता अपूर्ण है.

ये कार्यकारी शाखाओं का दायित्व है—स्थानीय, राज्य, और राष्ट्रीय-- सभी सरकारी स्तरों पर अपने अधिकार क्षेत्र में सभी प्रकार से हमारे नागरिकों को उक्त स्वतंत्रता प्रदान करें और उसकी सुरक्षा करें. ये विधायी शाखा का दायित्व है कि सभी स्तरों पर, जहां कहीं भी उक्त प्राधिकार फिलहाल पर्याप्त नहीं है, उसे पर्याप्त बनाए. और ये इस देश के सभी वर्गों के नागरिकों का दायित्व है कि वे दूसरों के अधिकारों का और देश के कानून का सम्मान करें.

ये सब विश्व शांति से असंबद्ध नहीं हैं. धर्मग्रंथ हमें बताते हैं,"जब किसी व्यक्ति का व्यवहार प्रभु को प्रसन्न करता है, तो वह अपने शत्रुओं तक के साथ शांति बना लेता है." और क्या पिछले विश्लेषण के आधार पर, शांति, मूलत: मानवाधिकारों का विषय नहीं है—बिना विनाश के भय के अपना जीवन जीने का अधिकार—प्राकृतिक हवा में सांस लेने का अधिकार—आने वाली पीढ़ियों के स्वस्थ अस्तित्व का अधिकार?

जब कि हम अपने राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा का प्रयास करते हैं, हमें मानव हितों की सुरक्षा का भी प्रयास करना चाहिए. और युद्ध तथा शस्त्रों का खात्मा स्पष्टत: दोनों ही के हित में होगा. कोई भी संधि, चाहे सभी के लिए वह जितनी लाभकारी हो, चाहे जितने भी कड़े शब्दों में वर्णित हो, छल और कुटिलता के खतरों के विरुद्ध पूर्ण सुरक्षा नहीं दे सकती. लेकिन—अगर ये अपने प्रवर्तन में पर्याप्त प्रभावी हो और अगर ये अपने हस्ताक्षरकर्ताओं के हितों के लिए पर्याप्त हो—तो एक कम न होने वाली, अनियंत्रित और अनिश्चित हथियारों की दौड़ की तुलना में कहीं कम जोखिम का वादा कर सकती है और अधिक सुरक्षा दे सकती है.

संयुक्त राज्य, जैसा कि दुनिया जानती है, कभी भी युद्ध की शुरुआत नहीं करेगा. हम युद्ध नहीं चाहते. हम अब युद्ध की अपेक्षा भी नहीं करते. अमेरिकियों की इस पीढ़ी ने पर्याप्त या यूं कहें कि पर्याप्त से भी अधिक युद्ध, घृणा और उत्पीड़न देख लिया है. अगर अन्य चाहें तो हम तैयार रहेंगे. हम इसे रोकने के लिए चौकन्ने रहेंगे. लेकिन हम शांतिपूर्ण विश्व के निर्माण में अपनी भूमिका भी निभाएंगे, जहां अशक्त सुरक्षित होंगे और शक्तिशाली न्यायशील. हम उस कार्य से पहले असहाय या उसकी सफलता को लेकर निराश नहीं हैं. विश्वासी और निडर, हम परिश्रम करेंगे—विध्वंस की योजना के प्रति नहीं वरन शांति की योजना के प्रति.